कंझावला कांडः निधि की संदिग्ध कहानी, पुलिस की भटकी हुई थ्योरी और आरोपियों के बदलते बयान... आखिर क्या है सच?
दिल्ली के कंझावला कांड में पुलिस की कार्रवाई हैरान कर रही है. अब गुरुवार को पुलिस ने अचानक कह दिया कि अंजलि को 12 किलोमीटर तक घसीटने वाली कार को दीपक नहीं बल्कि दूसरा आरोपी अमित चला रहा था. साथ ही पुलिस ने आरोपियों की संख्या अब 5 से बढ़ाकर 7 कर दी है. यानी पुलिस को अब दो अन्य आरोपियों की तलाश है. कुल मिलाकर ऐसा लग रहा है कि इस मामले में पुलिस ने शुरू में जो गलती की थी, क्या उसे कवर करने के लिए वो बार-बार गलतियां करती जा रही है?
कौन चला रहा था कार?
गुरुवार को दिल्ली पुलिस के स्पेशल कमिश्नर सागर प्रीत सिंह हुड्डा एक बार फिर मीडिया से मुखातिब हुए. उन्होंने बताया कि वारदात के वक्त कार दीपक नहीं बल्कि उसका साथी अमित चला रहा था. यानी आरोपियों ने पूछताछ में पुलिस से लगातार झूठ बोला था कि गाड़ी दीपक चला रहा था. हैरानी की बात है कि पिछले चार दिनों से पांचों आरोपी पुलिस की हिरासत में हैं. पुलिस लगातार उनसे पूछताछ कर रही है. और तब से पुलिस को ये भी नहीं पता था कि अंजलि की जान लेने वाली कार को चला कौन रहा था?
4 दिन में बदल गया कार ड्राइवर!
पहले पूछताछ में दीपक नाम के आरोपी ने बताया था कि गाड़ी वो चला रहा था. अब पांच दिन बाद पुलिस कह रही है कि कार दीपक नहीं अमित चला रहा था. इस खुलासे पर पुलिस का कहना है कि अमित के पास लाइसेंस नहीं था. इसलिए आरोपी दीपक उसे बचा रहा था. पुलिस का ये तर्क गले नहीं उतरता. स्पेशल सीपी ने कहा कि इस मामले की जांच के लिए 18 टीमें बनाई गई हैं, जो अपना काम कर रही हैं.
मामले के आरोपी 5 नहीं 7
दिल्ली पुलिस ने एक नया खुलासा और किया है. पुलिस का दावा है कि इस मामले में आरोपी पांच नहीं बल्कि सात हैं. दो आरोपी आशुतोष और अंकुश खन्ना हैं. अंकुश आरोपी दीपक का भाई है. पुलिस का कहना है कि वो इस मामले में मजबूत चार्जशीट बनाएगी ताकि कोई भी मुजरिम सजा से ना बच पाए. साथ ही स्पेशल सीपी ने साफ कर दिया कि अभी इस मामले की कंप्लीट पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और एफएसएल रिपोर्ट आनी बाकी है. ये दोनों रिपोर्ट आ जाने के बाद तस्वीर कुछ साफ होगी.
गलतियों पर गलतियां
कहते हैं एक गलती को छुपाने के चक्कर में गलती पर गलतियां होती जाती है. दिल्ली के कंझावला कांड में दिल्ली पुलिस ने पहले दिन जो गलती की, उसे छुपाने चक्कर में अब वो लगातार गलतियां करती जा रही है. इस मामले में पहले दिन से ही पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं. मगर बावजूद इसके पुलिस अंजलि की मौत का सच नहीं बता रही है. वारदात के पांच दिन बीत जाने के बाद भी दिल्ली पुलिस को इस केस में सच की तलाश है.
पुलिस की पहली गलती
दिल्ली को दहला देने वाले कंझावला कांड में घटना का पता चलते ही इलाके के डीसीपी साहब ने ऐलान कर दिया था कि मामला एक आम रोड एक्सीडेंट का है. इस केस का रेप या मर्डर से कोई लेना देना नहीं है. यानी कायदे से डीसीपी साहब ने पांचों आरोपियों को पहले ही दिन अपनी तरफ से क्लीनचिट दे दी थी. यही वो मौका था, जब पुलिस ने इस मामले में पहली गलती की.इसके बाद जैसे ही इस मामले ने तूल पकड़ा तो दिल्ली पुलिस को अपनी गलती का अहसास हुआ. इसके बाद पुलिस ने शुरू में दर्ज की गई हलकी एफआईआर में गैर इरादतन हत्या की धारा भी जोड़ दी थी.
निधि ने किया चौंकाने वाला खुलासा
अब ज़रा इस हादसे की इकलौती और सबसे अहम चश्मदीद यानी अंजलि की दोस्त निधि की बात करते हैं. निधि की बात सबसे अहम इसलिए है क्योंकि जब स्कूटी कार से टकराई तब निधि उसी स्कूटी पर अंजलि के पीछे बैठी थी. उसका कहना है कि कार में बैठे लोगों को पता था कि अंजलि कार में फंसी है. पर उन्होंने जानबूझकर कार भगाई और आगे पीछे की. निधि हादसे के बारे में अब तक की सबसे चौंकाने वाली बात कह रही है.
जानबूझकर अंजलि को कार के नीचे घसीटा
निधि साफ-साफ कह रही है कि जब स्कूटी कार से टकराई तब वो तो कार के दूसरी तरफ गिरी मगर अंजलि कार के नीचे अंदर की तरफ फंस गई थी. वो रो रही थी. चिल्ला रही थी. कार के अंदर शांति थी. कार में सवार लोग कार के नीचे फंसी अंजलि को देख रहे थे. मगर इसके बावजूद कार रोकने की बजाए पहले उन्होंने कार को आगे-पीछे किया और फिर कार के नीचे फंसी अंजलि को उसी हालत में घसीटते हुए कार भगा कर ले गए.
गैर इरादतन हत्या नहीं हत्या
अब बात करते हैं कानून की. लोगों के गुस्से, दबाव और फटकार के बाद दिल्ली पुलिस ने कार सवार पांचों आरोपियों के खिलाफ गैर इरादतन हत्या की धारा बाद में जोड़कर कोई अहसान नहीं किया. बल्कि एक तरह से कानून का मज़ाक ही उड़ाया है. क्योंकि कायदे से ये केस गैर इरादतन हत्या नहीं बल्कि सीधे-सीधे हत्या का है. जी हां, ये कत्ल का केस है. कम से कम केस की सबसे अहम और इकलौती चश्मदीद निधि के बयान के बाद तो अब शक की कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाती.
आईपीसी की धारा 302 का है केस
निधि के बयान से साफ है कि कार सवार लोगों को पता था कि वो क्या कर रहे हैं. बेशक कत्ल सोची समझी साज़िश का नतीजा नहीं था. ये कत्ल अचानक हुआ. पर मामला तो कत्ल का ही है. वो इसलिए कि कार सवार लोगों को जब अहसास हुआ कि उन्होंने स्कूटी को टक्कर मार दी है. और उनकी कार में एक लड़की फंस गई है. तो पांचों डर गए. उन्हें पता था कि लड़की जिंदा बच गई और बयान दे दिया तो पांचों पकड़े जाएंगे. लिहाजा, पहले से ही नशे में कार चला रहा कार का ड्राइवर अमित जिंदा अंजलि को कार से घसीटते हुए करीब 12 किलोमीटर तक भाागता रहा. फिर 12 किलोमीटर बाद कार में फंसी अंजलि की लाश बाहर निकाल कर पांचों मौके से भाग निकले. यानी यहां इन्टेंशन या मकसद अंजलि की जान लेना ही था. इसलिए कायदे से ये केस सीधे-सीधे आईपीसी की धारा 302 यानी कत्ल का है.
एफआईआर में धाराएं बढ़ा और घटा सकती है पुलिस
ऐसा नहीं है कि एक बार एफआईआर दर्ज होने के बाद उसमें धाराओं को बदला नहीं जा सकता. केस की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ती है और जैसे-जैसे नए सबूत या गवाह मिलते जाते हैं, उसी हिसाब से पुलिस धाराओं में फेरबदल भी करती है. अब अगर इस केस में निधि दिल्ली पुलिस की इकलौती चश्मदीद और सबसे अहम गवाह है, तो फिर उसकी इस गवाही के बाद दिल्ली पुलिस को फौरन अंजलि की मौत के मामले को हत्या का केस मानते हुए कत्ल की नई धारा एफआईआर में जोड़नी चाहिए. अगर दिल्ली पुलिस ऐसा नहीं करती है तो फिर मान लीजिए कि वो निधि के बयान को भरोसे लायक नहीं मानती
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